Shivendra Mohan Singh

कुछ नई, कुछ पुरानी और कुछ दिल की बातें ………

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यात्रा वृतांत - हास्य कथा

Posted On: 18 Apr, 2014 Others में

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आज कल चुनावी राजनीति की गहमा गहमी चल रही है, धड़ा धड़ राजनीतिक विषयों पे आर्टिकल पे आर्टिकल छप रहे हैं , ले तेरे की, दे तेरे की , धत तेरे की का सा वातावरण बना हुआ है। तलवारें अपने प्रतिद्वंदियों पर खिंची हुई हैं, ये अलग बात है कि भांजते भांजते कभी कभी वही तलवार खुद के तो कभी अपने ही पाले वाले का नाड़ा काट दे रही है। लेकिन बाज बहादुर फिर से नाड़े में गाँठ मार के मैदान डट जा रहे हैं और फिर से वही बतकही और जूतबाजी का दौर शुरू। एक बात बोलने की देर है दूसरा लपक के उस बात को उठा ले रहा है और बत्ती बना के वापस ?????? ???? अरे नहीं भाई …… दूसरे के फिर तीसरे के कान में डाले दे रहा है और घुमा फिरा के उस बत्ती में और बट मार के वापस बोलने वाले के ही कान में वापस दे दे रहा है, बोलने वाले को पता ही नहीं चल रहा है मेरी बोली हुई बात ही है या कोई और। मुंह बोलते बोलते भन्नाया हुआ है और कान सुनते सुनते झन्नाया हुआ है, दिमाग के १२ बजे हुए हैं,गर्मी इतनी है कि फूस कब आग पकड़ ले रहा है पता ही नहीं चल रहा है। नतीजा “कमल” फूल छाप “झाड़ू” कब “हाथ” के निशान के साथ कभी गाल पर तो कभी गर्दन पर छप जा रहा है। कहीं चल चल चल मेरे हाथी तो कहीं चांदी की साईकिल सोने की सीट का गान चल रहा है। इन्ही सब के बीच बस वाला तेज आवाज में “मुँहवा पे ओढ़ के चदरिया लहरिया लू—ट, ए राजा” का मधुर संगीत बिखेर रहा है। समझ के बाहर का जबरदस्त माहौल है।

खैर छोड़िये इन बातों को चलिए कुछ और सुनाता हूँ आपको ………………… यात्रा वृतांत

कल दीदी और छोटी बहनों के साथ कहीं जाना था, टैक्सी वाला कार लेके आ गया था एक घंटे का सफर था। लेकिन घर से निकलने में ही आधा घंटा निकल गया, कभी ये ले लो, कभी ये रख लो, कभी कुछ मिल नहीं रहा है उसका हड़कम्प। कभी उसने ये मंगाया था वो टाइम पे मिल नहीं रहा है। उसी में गरमा गर्मी , रूठना मनाना चल रहा था। खैर जैसे कैसे सफर पे निकल ही पड़े। गर्मी बहुत थी बाहर तो टैक्सी वाले को बोला की भाई एसी चला दे। वो अलग से गरम होने लगा की उसके अलग से चार्जेज लगेंगे पहले नहीं बताया था आपने ,पहले ऑफिस में बात करो। कुछ कह कुहा के उसने एसी चला दिया। “टाइम पे चलना नहीं होता है तो टाइम पे बुलाते क्यों हैं लोग” के मधुर कटाक्ष के साथ सेल्फ मारने की क्रिया आरम्भ हुई, खैर छोड़ो … चलो भाई चलो भाई के नारों के साथ यात्रा प्रारम्भ हुई।

बचपन से देख रहा हूँ जब भी कहीं जाना होता है और घर में रोड़ा ना मचे ये संभव ही नहीं है। ये सिर्फ मेरे ही घर का हाल नहीं है , लगभग सभी घरों का यही हाल है , शायद की कोई खुशकिस्मत होंगे जो बिना हल्ला गुल्ला मचाए चुप चाप चले जाते होंगे। इन्ही सब बातों में खोए मेरे जहन में कुछ पुरानी अपनी और कुछ दूसरों की बातें घूम गई, जो आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ :

​हमारे एक पारिवारिक भाई साहब अपने तीनों बच्चो के साथ कहीं जा रहे थे , बच्चे छोटे ही थे। भैया भाभी आगे बैठ गए और बच्चों को पीछे की सीट पे डंप कर दिया। बच्चों के बैठने स्थान फिक्स नहीं किया था, बस जी लड़ाई शुरू। एक लड़का और दो लड़कियां जैसा की हर घर का किस्सा है। अब शिकवा शिकायतों का दौर शुरु. ऐ पापा दे-ए-ख असुवा मार.…ता । लड़ाई की जड़ खिड़की के पास बैठने को था , बच्ची को समझा बुझा कर बीच में बैठा दिया गया और असुवा को किनारे की सीट मिल गई। नंग असुवा को कुछ ना कुछ शरारत तो करना ही था , गर्मियों के दिन थे , कार का एसी ऑन था लेकिन कूलिंग नहीं हो रही थी। ए … भाई एसिया बिगर गइल बा का। करवा तनिको ठंडात नइखे। कहले रहनी की जाए से पहिले करवा केहुके देखवा लीहा- भाभी ने कहा , बस यही महाभारत की शुरुआत थी। पलट के भैया का जवाब आया – दिमागवा दिनवा भर गरम रही त करवा कहाँ से ठंडाई। बस जी सब कुछ छोड़ के दोनों मियां बीबी एक दूसरे पे पिल पड़े पांच दस मिनट तोहार हमार, हई हऊ, एकरा ओकरा, में ही निकल गए, आपसी झगड़े में किसी ने कारण ढूंढने की कोशिश नहीं की और ऊपर से दोनों मुंह अलग से फुला के बैठ गए। खैर जैसे तैसे लड़ाई खत्म हुई तो बीच में बैठी हुई बच्ची ने बताया की असुवा ने खिड़की खोल रखी है। एहिसे करवा ठंडात नइखे। फिर क्या था भइया की मुख रुपी तोप असुवा की तरफ घूम गई। ए सोसुर तोहार दिमागवा ख़राब बा का, खिड़िकिया काहे खोलले बाड़े। एक बार तो मारने के लिए भी लपके लेकिन ये तो कहिये बाजार के बीच से जा रहे थे और रोड पर भीड़ ज्यादा थी, नजर हटी और दुर्घटना घटी वाला माहौल था और आसु बाबू बच गए। थोड़ी देर बाद जगह पा भइया फिर से लपकने की कोशिश कर थे की आसुवा को एक आध कंटाप लगा दें। लेकिन भाभी उनकी मंसा भांप चुकी थीं सो उन्होंने वहीँ बैठे बैठे धमकी भरा अल्टीमेटम सुना दिया कि ओकरा के मरनी त ठीक ना होई। अब्बे हम चलत कार से उतर जाइब। बोलते बोलते उन्होंने अपने साइड का दरवाजा भी एक बार खड़का दिया। भइया माहुर कूंच के रह गए और असुवा को परसादी देने से वंचित किये जाने का अपराधबोध लिए चुप चाप गाड़ी चलाते रहे। लेकिन गंतव्य पर पहुँचने के पश्चात् सामान इधर उधर रखने के मध्य भइया ने अपनी दबी हुई भड़ास निकालने की मंसा से “ए ससुर ठीक से उठावा” कह कर कान तो उमेठ ही दिया था असुवा का। वो भी पट्ठा गजब का तेज था कान घुमाते ही जोर से चीख बैठा, हां हां का भइल का भइल का नारा समवेत वातावरण में गूँज उठा। कूछ ना….. कूछ ना.…कह कर भइया ने बात बनाने की कोशिश की, तनी मूड़ी लड़ गइल ह केवाड़ी से कह कर बात को दबाने की कोशिश की भइया ने। भाभी असुवा के चीख मारते ही समझ गई थी कि ये हरकत क्या है। खैर एक आदर्श भारतीय नारी की तरह उन्होंने बात को आगे ना बढ़ाते हुए, आवा बाबू आवा बाबू कह कर बच्चे का सर सहलाते हुए बात को वहीँ ख़त्म कर दिया।

शेष फिर कभी …… (पहली बार की लिखावट है इसलिए आप लोगों से माफ़ी की पूरी गुंजाइश है)

Web Title : कुछ नई, कुछ पुरानी और कुछ दिल की बातें ………

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Taimi के द्वारा
October 17, 2016

It’s a pleasure to find such raittnalioy in an answer. Welcome to the debate.

harirawat के द्वारा
April 28, 2014

शिवेंद्र जी बहुत सुन्दर लेख है ! घर घर की कहानी है, लेखनी में दम है इसलिए लिखते रहिए ! बधाई हरेन्द्र जागते रहो

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    May 3, 2014

    उत्साहवर्धन के बहुत बहुत शुक्रिया हरी रावत भाई जी। — सादर,

deepak pande के द्वारा
April 27, 2014

सहज लेखन सच ही है सहज ही उत्तम है AADARNIYA SHIVENDRA जी उत्तम लेख

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 28, 2014

    सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेय जी। आभार। ​

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 28, 2014

    बहुत बहुत शुक्रिया आनंद प्रवीन जी।

    शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
    April 26, 2014

    बहुत बहुत शुक्रिया सारस्वत जी.

jlsingh के द्वारा
April 20, 2014

का महराज, कहाँ छिपल रहलीं इतना दिन से सच्चो ई चुनाव के माहौल में गुदगुदा दिहलीं… गोर लागतानी …अइसने वृतांत चालू रहे ताकि मंच पर हरियरी बनल रहे …

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 21, 2014

    ​ना जी महराज बहुत दिन से हिम्मत मारत रहलीं लेकिन जोर ना लागत रहे। अब तनी फुर्सत पईनीं ​ह त लीख दिहनि ह। रउवा सभे के ब्लॉग प् अइनी, प्रेरणा दिहनि , बड़ा सौभाग्य हमार। आशीर्वाद बनवले रखीं।

April 19, 2014

bahut sundar yatra vritant .

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 20, 2014

    ब्लॉग पर पधारने और उत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया बहन।

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
April 19, 2014

rochak prastuti hetu badhai

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 20, 2014

    ब्लॉग पर पधारने और ​टिप्पणी ​ करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया बहन।

sadguruji के द्वारा
April 19, 2014

आदरणीय शिवेंद्र मोहन सिंह जी ! मंच पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है ! व्यंग्य और हास्य के मिलेजुले सफर के साथ साथ भोजपुरी भाषा की मिठास मन को गुदगुदा गई ! इस मंच पर लेखकीय सफर आपका शुरू हुआ है उसके लिए बधाई और शुभकामनाएं !

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 19, 2014

    शुभ भावना, शुभ कामना, उत्साहवर्धन और स्नेह आशीर्वाद देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया. इस ब्लॉग पर आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय रहेगी.

pkdubey के द्वारा
April 19, 2014

bahut khoob.bahut kuchh likh diya aap ne.politics ,family ,hasy ,vyang.sadar badhai.

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    April 19, 2014

    हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया दूबे जी. आभार


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