Shivendra Mohan Singh

कुछ नई, कुछ पुरानी और कुछ दिल की बातें ………

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अच्छे दिन आने वाले हैं

Posted On: 30 May, 2014 Others में

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अहंकार की थी पराकाष्ठा
उन्मत्त थे बोल
शासन बना था कुशासन
मेढ़ खाती थी खेत
रखवाला बना था सेंधमार
सीमाएं थी असुरक्षित
शत्रु हो रहे थे प्रबल
सर ऊंचे हो रहे थे बागिओं के।
प्रजा थी परेशां

एक आंधी सी आई
छंटा तब कुहाषा
काली बदली से निकला
आशाओं का सूरज
मन की उमंगों ने ली
एक अंगड़ाई
सुनहले दिनों की
एक आभास आई।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 31, 2014

काली बदली से निकला आशाओं का सूरज मन की उमंगों ने ली एक अंगड़ाई सुनहले दिनों की एक आभास आई। सबका साथ सबका विकास! लगी है अब उन पर आश!

    Shivendra Mohan Singh के द्वारा
    June 2, 2014

    “सबका साथ सबका विकास! लगी है अब उन पर आश!” आदरणीय सिंह साहब बहुत ठीक कहा आपने लेकिन जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं का बोझ डालना भी ठीक नहीं है. अभी तो गाड़ी पटरी पर लाना है विकास तो उसके बाद की बात है. सादर


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